वैज्ञानिकों के एक नए प्रयोग से हैरान करने वाला खुलासा हुआ हैं। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु हमले के बाद दुनियाभर के वैज्ञानिकों को यह फिक्र सताने लगी कि कहीं इस तरह की घटनाएं पूरी धरती के विनाश का सबब न बन जाएं।

इसी सोच से एक आइडिया निकलकर सामने आया आइडिया एक ऐसी घड़ी बनाने का आया जो दुनिया के सामने मौजूद विनाश की चुनौतियों को दर्ज करे। साथ ही ये घड़ी दुनिया को इस बारे में अलर्ट भी करे कि इंसानों के कौन से काम धरती की तबाही की वजह बन सकते हैं। ऐसी ही घड़ी बनाने के मकसद से 15 वैज्ञानिकों के एक दल ने नॉन टेक्निकल एकेडमिक जर्नल के रूप में एक संगठन- ‘द बुलेटिन ऑफ द अटॉमिक साइंटिस्ट्स’ का गठन किया।

जिसमें मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भी शामिल हैं। यह संगठन ऐसे खतरों का आंकलन कर समय-समय पर दुनियाभर के लोगों को आगाह करता है कि धरती तबाही के कितने करीब है।

डूम्सडे क्लॉक बताएगा महाप्रलय का वक़्त

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर एटमी हमले से हुए भारी विनाश के दो साल बाद 1947 में पहली बार ‘डूम्स डे क्लॉक’ को आधी रात यानी बारह बजे से 420 सेकंड की दूरी पर सेट किया गया था। उस वक्त माना गया कि इस घड़ी में 12 बजने का मतलब होगा कि अब धरती पर इंसान की तरफ से तैयार की गई प्रलय का वक्त आ गया है। साल दर साल ‘डूम्सडे क्लॉक’ में बदलाव किया जाता रहा। इन बदलावों के पीछे परमाणु युद्ध, जलवायु परिवर्तन, जैव सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर टेरर, हैकिंग और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसे कई खतरे और टॉप पदों पर बैठे लोगों की बयानबाजी को वजह बताया गया है।

1953 में जब अमेरिका ने पहले हाइड्रोजन बम का टेस्ट किया, तो डूम्सडे क्लॉक में प्रलय का वक्त सिर्फ 2 मिनट दूर माना गया। हालांकि 1969 में जब परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए गए, तो इस घड़ी की सुइयां पीछे हटाकर आधी रात से 10 मिनट की दूरी पर ले जाई गईं। अब एक बार फिर दुनिया पर तबाही का खतरा मुंह फैलाए खड़ा है और फासला ज्यादा नहीं रह गया है।

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