इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव की सबसे बड़ी खासियत थी अरविंद केजरीवाल का बदला हुआ रूप। यह वह केजरीवाल नहीं थे, जिसके लिए वह जाने जाते रहे हैं। 2013-15 के केजरीवाल बेहद झल्लाने वाले, भावुक और कभी भी किसी पर बरस पड़ने वाले थे। केजरीवाल इस चुनाव में संभल कर चलने वाले, सोच विचार कर फैसले लेने वाले और अनावश्यक टिप्पणियों से बचने वाले दिखे। वह अगर पहले वाले होते, तो अमित शाह के यह कहने पर कि केजरीवाल शाहीन बाग क्यों नहीं जाते, फौरन प्रतिक्रिया दे देते और उन्हें उसका वैसा ही चुनावी खमियाजा भुगतना पड़ता जैसा कि पंजाब चुनाव या उसके पहले देखने को मिला था।

इस चुनाव में सबसे अहम बात यही थी कि केजरीवाल ने कैसे अपने को बदला। 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल ऐसी विजय रथ पर सवार थे, जिससे नीचे देखना उन्हें गंवारा नहीं था। उन्हें लगने लगा था कि वे नरेंद्र मोदी को टक्कर दे सकते हैं और देश उनमें मोदी का विकल्प देख रहा है। यह अकारण नहीं है कि 2014 लोकसभा चुनाव के समय केजरीवाल की टीम ने गुजरात जाकर मोदी के विकास के मॉडल की हवा निकालने की कोशिश की। ये भी अकारण नहीं है कि केजरीवाल ने दिल्ली छोड़ बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला किया। 2015 में जब मोदी अपराजेय लग रहे थे, तब दिल्ली में 70 में से 67 सीटें जीतकर मोदी के गुब्बारे में सुई चुभोने का काम किया था। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने हर मुद्दे पर मोदी पर हमले शुरू किए। केजरीवाल की बातें लोगों को पसंद नहीं आईं। उनकी यह हठधर्मिता पार्टी को बहुत भारी पड़ी।

एमसीडी की हार से उन्होंने सबक सीखा और मोदी पर हमले बंद कर दिए। नतीजा सबके सामने है। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि लोकसभा में आप बुरी तरह हारी थी। लेकिन उसी समय सीएसडीएस का एक सर्वे दिल्ली के बारे में आया था। उसके मुताबिक आप भले ही तीसरे नंबर पर थी, पर दिल्ली के वोटरों ने साफ कहा था कि विधानसभा में उनकी पहली पसंद आप और केजरीवाल ही होंगे। आज सर्वे की बात सच साबित हुई। यानी केजरीवाल की चुप्पी काम आई। वे जो दादरी में अखलाक की हत्या पर दौड़कर उसके घर गए थे, वही केजरीवाल शाहीन बाग में बैठी महिलाओं के समर्थन में नहीं उतरे। एमसीडी और लोकसभा की हार के बाद केजरीवाल यह समझ गए कि हिंदू-मुसलमान के सवाल पर अगर वह भाजपा से उलझे, तो फिर वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएंगे, जिससे निकलना नामुमकिन होगा। लिहाजा केजरीवाल अमित शाह के उकसाने के बाद भी शाहीन बाग नहीं गए। उलटे वह हनुमान चालीसा पढ़ते पाए गए। यह 2020 के केजरीवाल थे, जिन्होंने मोदी के समक्ष हार मान ली और इसलिए पूरे चुनाव में एक बार भी मोदी पर निजी टिप्पणी नहीं की।

इस चुनाव में एक और सबक है कि राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत की राजनीति की ज्यादा उम्र नहीं होती है। भाजपा इस मुगालते में थी कि शाहीन बाग और नागरिकता कानून का सवाल उठाकर, तीन तलाक कानून लागू कर, अनुच्छेद 370 में बदलाव कर और राम मंदिर निर्माण की बात कर आसानी से हिंदू वोटरों को लुभा लेगी, तो ऐसा होने वाला नहीं है। एक सर्वे के मुताबिक, 70 फीसदी लोग यह मानते थे कि नागरिकता कानून पर आंदोलन सही नहीं है, लेकिन सिर्फ एक फीसदी लोगों ने इस आधार पर वोट दिया। एक्सिस माई इंडिया के इस सर्वे का यह नतीजा आंख खोलने वाला है। यानी भाजपा को यह सोचना चाहिए कि लोकसभा में बंपर जीत के बाद भी राज्यों में भाजपा मनमुताबिक नतीजे नहीं ला पाई यानी भाजपा को हिंदू वोट बैंक का फायदा तो मिल रहा है, पर अगर रोजमर्रा के मामलों पर सरकार यदि प्रदर्शन नहीं कर पाई, तो रोटी, कपड़ा और मकान भाजपा को सत्ता से दूर भी कर *सकते हैं।

आप ने पिछले पांच साल में दिल्ली में काम किया है। बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार ने बुनियादी काम किए हैं और न केवल काम किए हैं, बल्कि सोशल मीडिया और मीडिया के जरिये काम करने वाली सरकार की इमेज भी बनाई है। यह बात खास है कि सरकार के प्रदर्शन को हिंदू वोट बैंक से जोड़ने की आप की कोशिश नई है। हालांकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सबसे पहले यह प्रयोग नरेन्द्र मोदी ने 2014 में किया था। तब मोदी ने गुजरात में विकास का मॉडल और हिंदू वोट को एक कर दिया था। लोगों को इस नए प्रयोग ने सम्मोहित किया था। उसी राह पर अब केजरीवाल चल रहे हैं।

देखना यह होगा कि दिल्ली के संदेश को भाजपा कितना ग्रहण करती है। अगर आगे भी वह दिल्ली वाली गलती करती रहेगी, तो मुश्किल होगी। जनता को रामभक्त पसंद हो सकते हैं, लेकिन वह गोली मारो. के साथ नहीं रहेगी।

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